सुनहरी धूप खिली है मेरे आँगन में
आज बहुत दिनों के बाद,
सोच रहा हूँ सुखा लूँ
रूह को तार पे।
बहुत दिनों से बे-ज़ार
ठंडे कोने में पड़ी हुई है,
कुछ शिकनें सिलवटें आ गई हैं
सफ़ेद काले चक्कते भी देखे थे।
धुल तो गई कई दफ़ा थी रूह
मगर दाग़ नही गए थे,
आज सुनहरी धूप खिली है
बहुत दिनों के बाद।
रूह को तार पर सुखा कर देखता हूँ
शायद वो दाग आप ही चले जाएँ,
नही तो कोई बात नही
यूँ ही बहाने से एक बार फिर
धूप ही देख लेगी रूह मेरी।।
Saturday, 8 September 2018
आँगन की धूप
Thursday, 9 August 2018
ज़िन्दगी
दिल के अरमानों का क्या है दे देंगे।
तुम्हारी खुशी के लिए तुम्हें भुलाना ही तो है,
इन फ़रमानों का क्या है दे देंगे।
तुम्हें दिल से भुलाने में।
कुछ सावन चंद रातें लगेंगी बस,
तुम्हारे बग़ैर इसको सुलाने में।
अकेला ये दिल नही टूटेगा।
मेरे हाथ से सिर्फ़ तुम्हारा दामन ही नही,
छूटेगा तो धड़कनों का साथ भी छूटेगा।
हम क्या से क्या हुए।
आबाद करने निकले थे,
उल्टा तबाह हुए।
तुम्हारे कूचे से जा रहे हैं।
आँखों में आँसूं होंठो पर हँसी लिए,
धुन कोई गुनगुना रहे हैं।
दुनिया की महफ़िल में।
बस अब बहुत क़ातिल ढूँढ़ लिए इस,
ज़िन्दगी के साहिल में।।
Wednesday, 25 July 2018
इमकान
उनके लौट आने की अभी इमकान बाक़ी थी,
मेरी रूह में अभी जान बाक़ी थी।
यूँ तो कई दफ़ा मिला हूँ आईने में उस शक़्स से,
फिर भी हम दोनों की अभी पहचान बाक़ी थी।
मुश्क़िलें जो थी वो तो कब की पार हो गई,
मुश्क़िलें जो हैं वो अभी आसान बाक़ी थी।
पंख जो थे कभी वो हैं अभी भी वहीं,
बस और कुछ नही अभी उड़ान बाक़ी थी।।
Saturday, 14 July 2018
हालात-ए-दिल
आसमान को सागर भिगोते देखा,
आज मैंने बादल को रोते देखा।
कैसे मिल जाते हैं दो लोग अजनबी,
हमने तो अपनी क़िस्मत को हमेशा सोते देखा।
कितनी आसानी से लोग दिल से उतार देते हैं,
हमने खुद को ये बोझ हमेशा ढ़ोते देखा।
कौन है वो जो दिल में नफ़रत भरते हैं,
हमने तो सिर्फ़ प्यार को बोते देखा।
ढूंढ़ लेते हैं लोग जीने की आरज़ू,
हमने ख़ुद में से ख़ुद को खोते देखा।।
Wednesday, 11 July 2018
एक लड़की है
तेरे आग़ोश में अब मैं पिघलने लगा हूँ,
मत रोक मुझे, अब मैं संभलने लगा हूँ।
सिकुड़े रहते थे जो होंठ कभी, अब हँसते हैं,
तेरी मोहब्बत में अब मैं बदलने लगा हूँ।
बड़े ही ग़फ़लत से दिल को तक़सीम किये बैठे थे,
तेरी बदमस्त आदाओं के चलते अब मैं ढ़लने लगा हूँ।
मेरी आँखों में रूह कहीं ठंडी पड़ चुकी थी,
तेरे देखने से अब मैं जलने लगा हूँ।
जहाँ रुका हुआ था जहाँ सारा,
ख़ुद की उँगली पकड़ अब मैं चलने लगा हूँ।।
Sunday, 20 May 2018
अधूरा मैं
पता नही क्यों वो समझते हैं कि मुझे कोई कमी नही है,
कि मेरी आँखों में नमी नही है।
पता नही क्यों उन्हें लगता है कि मैं बहुत समझदार हूँ,
हर दुख हर ग़म से बे-असरदार हूँ।
मगर कभी देख सको तो इन आँखों के नीचे
काले निशानों को देखना,
अगर कभी देख सको तो उन आँखों में सूख चुके
अरमानों को देखना।
कभी सुन सको तो मेरी खामोशी की चीख़ों को सुनना,
कभी छू सको तो उन तरसते एहसासों को छूना।
तब कहीं शायद तुम मुझे देख सकोगी,
तब कहीं शायद तुम मुझे समझ सकोगी।
तब कहीं शायद तुम समझोगी मैं क्यों बरसता हूँ,
तब कहीं शायद तुम समझोगी मैं क्यों तरसता हूँ।
मैं तरसता हूँ उस मुस्कुराहट के लिए
जिसकी वजह मैं हूँ,
मैं तरसता हूँ उस परेशानी के लिए
जो मेरे लिए हो।
मैं तरसता हूँ उस ज़िद के लिए,
जो कोई मुझसे करे,
मैं तरसता हूँ उस लड़ाई के लिए
जो कोई मुझसे मेरे लिए लड़े।
अपना भी एक सपना है कि कभी
मैं भी किसी के सपने से गुज़रूँ,
कभी कोई ऐसा भी हो कि जिसे
मेरे हाथ की गरमाहट से आराम मिल जाये।
मैं तरसता हूँ किसी ऐसे के लिए
जिसके लिए मैं ज़रूरी हूँ,
मैं तरसता हूँ किसी के लिए
जिसका मन सिर्फ़ मेरे सामने खुले।
मैं तरसता हूँ किसी के लिए
जो मुझे अपनी तन्हाई का साथी माने,
मैं तरसता हूँ किसी ऐसे के लिए
जो मुझसे सब हाल खोल के रख दे।
मैं तरसता हूँ किसी ऐसे के लिए
जिससे ज़िन्दगी का भी कोई पर्दा न हो।।
Friday, 4 May 2018
कैसे
दिल मे जो दफ़्न है वो बताऊँ कैसे,
जो न बताऊँ तो फिर छुपाऊँ कैसे।।
जो अल्फ़ाज़ अभी तक समझा नही पाए,
उस प्यार को तुम्हें जताऊँ कैसे।
जिस ख़्याल का तुम्हारे ख़्याल पर पहरा है,
उस पहरे को ख़्याल से हटाऊँ कैसे।
न जाने कैसी पशोपेश में तुमने उलझा रखा है,
तुम्हें जीतने के लिए तुम्हें हराऊँ कैसे।
तुमने तो कह दिया तुम्हें भूल जाना अच्छा है,
ख़ुद को पाने के लिए तुम्हें गवाऊँ कैसे।।