Monday, 19 March 2018

तुम और मैं

जब भी वो मुझे देखती है तो ऐसा लगता है,
जैसे रात देखती है चाँद को,
जैसे भँवरा देखता है फूल को,
जैसे मछली देखती है पानी को,
जैसे तुम देखती हो मुझे।

जब भी तुम मुस्कुराती हो मुझे देखकर तो ऐसा लगता है,
जैसे धरती मुस्कराती है बादल देखकर,
जैसे बच्चे मुस्कुराते है बारिश देखकर,
जैसे पंछी मुस्कुराते है हवा देखकर,
जैसे तुम मुस्कुराती हो मुझे देखकर।

जब तुम्हारा हाथ मेरे हाथ को छूता है तो ऐसा लगता है,
जैसे ओस ने छू लिया हो पत्तों को,
जैसे पानी ने छू लिया हो किनारों को,
जैसे छाँव ने छू लिया हो किरणों को,
जैसे तुम्हारे हाथ ने छू लिया हो मेरे हाथ को।

जब भी तुम मेरा इंतेज़ार करती हो तो ऐसा लगता है,
जैसे हरियल इंतेज़ार करता है पहली बारिश का,
जैसे अंकुर इंतेज़ार करता है थोड़ी सी नमी का,
जैसे सूरज इंतेज़ार करता है सुबह का,
जैसे तुम इंतेज़ार करती हो मेरा।

और जब तुम मुझे इतना प्यार करती हो तो ऐसा लगता है
जैसे रोशनी करती है जीवन से,
जैसे दिल करता है धड़कनों से,
जैसे आँसू करते है आँखों से,
जैसे तुम करती हो मुझसे।।

Tuesday, 13 February 2018

रात

उस दिन जब रात मेरे कमरे में आई थी,
मुझे याद है मेरे कानों में कुछ गुनगुनाई थी।।

कहीं दूर किसी के दिल में कुछ तो ज़रूर हुआ था,
यूँ ही नही वो हवा मुझसे शरमाई थी।।

जम चुकी थी जो चादर जज़्बातों की इस दिल पर,
देख तेरी साँसों की गरमाहट से कैसे नरमाई थी।।

मुझे याद है जब ज़ोर से मैंने तुम्हारा हाथ पकड़ा था,
ख़ुदा कसम उस रात तुम बहुत घबराई थी।।

तुम्हारी यादें जो लेके आई थी ये हवा,
अब समझता हूँ क्यों वो इतराई थी।।

Friday, 9 February 2018

अधूरी मोहब्बत

जब भी मैं और मेरा सुकून बातें करते हैं,
तुम्हारी यादों से जब दो मुलाक़ातें करते हैं।
कभी हँसते है कभी रोते हैं तुम्हारा नाम लेकर,
तो कभी उस ख़ुदा से फ़रियादें करते हैं।।

उन जी चुके लम्हों को फिर जीने का मन करता है,
उन टपकते लफ़्ज़ों को फिर पीने का मन करता है।
कुछ तो था उस वक्त में जिसे मैं भूल नही पाता हूँ,
उन बिखरे हुए रिश्तों को फिर सीने का मन करता है।।

क्यों मैं ही टूटता हूँ हर बार हम दोनों में,
क्यों तुम ही रूठती हो हर बार हम दोनों में।
क्यों मेरे हर ज़िक्र में सिर्फ़ तुम्हारा ही ज़िक्र रहता है,
क्यों मेरे ही आँखों से आँसू का दरिया बहता है।।

उन सपनों के हालात बदलते देखे है,
तुम्हारी आँखों से जज़्बात बदलते देखे है।
अपनी अना को तुम्हारे आग़ोश में तोड़ा कई बार हमने है,
अपने क़दमो को तुम्हारी राहों में मोड़ा कई बार हमने है।।

बात अब बस इतनी सिमट कर रह गई है,
मेरी मोहब्बत मुझसे लिपट कर रह गई है।
कोई ग़म नही कोई शिकवा नही कोई मलाल नही है,
मेरी अधूरी मोहब्बत से अब कोई सवाल नही है।।

Sunday, 7 January 2018

पत्र

मानता हूं कि तुम दुनिया की
सबसे अच्छी लड़की नहीं हो,
मगर तुमसे अच्छी बहन
और कोई हो नहीं सकती थी।

मानता हूं कि तुम समझती हो कि
तुम बहुत समझदार हो गई हो,
मगर मेरे लिए तुम वहीं
नादान लड़की हो।

मानता हूं कि तुम्हे लगता है कि
तुम अब बड़ी हो गई हो,
मगर मुझे तुम अब भी वही
आंगन में उड़ती नन्ही तितली लगती हो।

ऐसा नहीं है कि मुझे विश्वास नहीं
तुम्हारी आकांक्षाओं का मुझे आभास नहीं,
हर साल एक कदम तुम बढ़ ही रही हो
दुनिया की हर बात पढ़ ही रही हो।

मगर वो क्या है ना तुम चाहे
कितनी बड़ी हो जाओ,
मगर मेरे लिए तुम वहीं
नन्ही परी रहोगी।

बस आज इतनी ही बात कहता हूं
बाकि तुम पर निर्भर रहता हूं,
हंसो गाओ मुस्कुराओ
आज तुम्हारा दिन है।।

Thursday, 5 October 2017

मिलन

एक ज़ोरदार गर्जन के साथ आसमान में बिजली कौंधी है,
मिलन की आस लिए धरती फिरसे मचलने लगी है।
एक अरसे बाद अपनी प्रियसी से मिलने
मेघ आयें हैँ।।

भागी भागी बयार आई है,
संग अपने, पिया की आहाट लाई है।
पंछी सब ख़ुशी के मारे झूम रहे हैं,
पेड़ सभी आवभगत में घूम रहे है।
थाल आरती का लिए मोर आएं हैं,
एक अरसे बाद अपनी प्रियसी से मिलने
मेघ आयें हैँ।।

मेमने, बछिया हिरनी सब मैदान में बडीं  है,
गाँव की किशोरियाँ जैसे मुंडेरी पर खड़ीं है।
मारे खुशी के गौरैया चारों ओर भगी है,
पाहुन की झलक पाने की सब में होड़ लगी है।
कोयल झूम के सबको मंगल गीत सुनाये है,
एक अरसे बाद अपनी प्रियसी से मिलने मेघ आये हैं।।

लज्जाती हुई प्रियसी दुकड़िये में आ जाती है,
अंततः काली घटा अम्बर में छा जाती है।
बड़ी देर भयी पिया अबके तुमको आने में,
दो पहर और शेष बचे थे हमरे मुरझाने में।
कान पकड़े, प्रियसी को देखो मेघ मनाये है,
एक अरसे बाद अपनी प्रियसी से मिलने मेघ आये है।।

खोले किवाड़ प्रियसी अपने पिया के स्वागत में,
जैसे धरती बाँहे खोल खड़ी है भाद्रपद में।
बाँध प्रेम बूँद की गठरी में मेघ बरसाए है,
मंत्रमुग्ध पिया मन ही में मुस्काये है।।
दिन हो गए पूरे विरह के,
सब दुःख अंतर से उड़ जाये है।
आई मिलन की बेला देखो
धरती कैसे शरमाये है।
एक ज़ोरदार गर्जन के साथ आसमान में बिजली कौंधी है,
एक अरसे बाद अपनी प्रियसी से मिलने
मेघ आयें हैँ।।

Saturday, 19 August 2017

तरस

ये कैसा तरस मैं ख़ुद पर खाने जा रहा हूँ,
अपनी मौत की ख़बर मैं ख़ुद सुनाने जा रहा हूँ।।

दो आँखे भी नहीं कमा पाया मैं ज़िन्दगी भर,
अपने जनाज़े में मैं आँसू बहाने जा रहा हूँ।

बूँद बनकर जिया तो सिर्फ टपकता ही रहा,
आज बादल बनकर आसमान में छाने जा रहा हूँ।

सब कुछ ख़ो दिया इस ज़िन्दगी के सफ़र में,
आज उन सभी रिश्तों को पाने जा रहा हूँ।।

लफ़्ज़ों की मिठास से अनजान ही रहा हूँ मैं,
आज मोहब्बत की धुन को गाने जा रहा हूँ।।

जिस ज़िन्दगी को इस ज़िन्दगी में मैं जी नहीं पाया,
उस ज़िन्दगी को मैं एक और दफ़ा लाने जा रहा हूँ।।

ये कैसा तरस में ख़ुद पर खाने जा रहा हूँ,
अपनी मौत की ख़बर मैं ख़ुद सुनाने जा रहा हूँ।।

Thursday, 20 July 2017

याद

तुम्हारे बदन पर मेरी उँगलियों की लिखावट याद आती है,
तुम्हारे होठों पर सुर्ख़ लाली की सजावट याद आती है।।

वो नज़दीकियाँ इन आँखों में आज भी उतनी जवान है,
उन नज़दीकियों में तेरी साँसों की गरमाहट याद आती है।।

शायद देर से आने की आदत वही बरक़रार है अभी तक,
आज उन शामों में तेरी झुंझलाहट याद आती है।।

यहाँ बेवजह नाख़ुश से रहते है सभी नजाने क्यों,
यहाँ आकर मुझे तेरे गुस्से की बनावट याद आती है।।

कौन जानता है वो कुचला कौन गया, क्या फ़र्क़ पड़ता है,
इन ग़ैरों की मतलबी दुनिया में तेरी घबराहट याद आती है।।

कुछ बात थी तुम्हारे छूने में,एक अलग सा एहसास था,
अब इन तनहा रातों में वो सरसराहट याद आती है।।

मालुम नहीं कुछ बचा पाया हूँ क्या,
मुझे अब मेरी आहाट याद आती है।।