Saturday, 2 January 2016

वो रात

वो अधरि-सी रात थी,
वो अधसोयी-सी रात थी।
आसमाँ जैसे सूना हो गया,
समय विरह का दूना हो गया।

हम यूँ खामोश बैठे थे,
आँखों में ग़म समेटे थे।
होंठो ने हँसी को ओढ़ा था,
शायद किस्मत ने मुँह मोड़ा था।

शोर ख़ामोशी का बड़ रहा था,
दिल पर कोई दर्द गढ़ रहा था।
अँधेरे आसमां के तले बैठे थे,
लगा किसी बोझ में दबे बैठे थे।

थक गया है दिल,
हर आस को हकीकत देते-देते,
अब सोता हूँ, इसे आराम देता हूँ,
और फिरसे देखता हूँ वही सपने
मीठे-मीठे।।

नन्ही परी

स्वर्ग से जैसे उतर आई,
कोई नन्ही परी।
झोली में अपने खुशियाँ लाई,
कोई नन्ही परी।

आँगन में चहके दिन-दोपहरी,
मन-मन में महके हिरन कस्तूरी|
मुस्काये तो सबका दिन बनादे,
आंसू बहाये तो सबको रुलादे|
आसमां में जैसे घटा छाई,
ऐसी है नन्ही परी।
स्वर्ग से जैसे उतर आई,
कोई नन्ही परी।

सोचे बिना सब काम वो करती,
समझे बिना सबसे वो लड़ती।
रूठे खुद ही, खुद ही मनाये,
पलभर का गुस्सा, पल में उड़ाए।
डाल पर कली कोई खिल आई,
ऐसी है नन्ही परी।
स्वर्ग से जैसे उतर आई,
कोई नन्ही परी।

मासूमियत तेरे चेहरे पर,
यूँही बनी रहे।
ओढ़नी तेरी रंगो से,
यूँही घनी रहे।
प्यार ही प्यार मिले तुझको,
दुःख सब दूर, डर जाये।
आज के दिन दुआ है मेरी,
दुआओं से झोली तेरी भर जाये।
ओस की बूंदे पत्तो पर जैसे उतर आई,
ऐसी है नन्ही परी।
स्वर्ग से जैसे उतर आई,
कोई नन्ही परी।
झोली में अपनी खुशियाँ लाई,
कोई नन्ही परी।।

happy birthday lil sis....

Tuesday, 3 November 2015

प्रेम

ये प्रेम नहीं है सावन का,
ये प्रेम नहीं है रावण का।
ये तार दिलों के बीच जुड़े,
ये प्रेम बड़ा है पावन सा।

संग-संग बीते हम,
हर गर्मी बरसात में।
हम जवां होते रहे,
हर नई मुलाकात में।

जब वक्त का पहिया चलता है,
जब उगता सूरज ढलता है।
जब आँखों में पलकों के नीचे,
कोई प्यारा सपना पलता है।

एक सुन्दर संसार बनाये हम,
एक महकती फुलवार बनाये हम।
सुबह को होली शाम दिवाली,
 संग हर बार मनाये हम।

एक दिन  वो भी आना है,
जब हमको रुख़्सत हो जाना है।
तेरी बाँहो की शैय्या में लेटे हो,
और आँखों में आँसू लपेटे हो।

आओ प्रिय विदा ले हम,
एक छोटी-सी आस लिए।
फिर मिलेंगे उसी कक्षा में,
एक नई शुरुआत लिए। 

Monday, 2 November 2015

आज़ाद पंछी

मैं आज़ाद पंछी,
दो डाल का निवासी हूँ।
एक डाल मस्जिद में पड़ती,
तो दूजे मैं  काशी हूँ।

पलक झपकते ही उड़ जाऊँ,
 एक डाल से एक डाल।
फ़िक्र नही कल आज की,
बीते महीने साल।

आसमान में गोते लगाते,
नज़र पड़े जब इस धरा पे।
एक अजब चित्र दिख जाता,
जो मेरे मन को चुभ जाता।

इस सुन्दर धरती पर,
एक रेखा लम्बी-सी खिंची हुई।
देखे कोई, तो लगे है ऐसे,
जैसे दो टुकड़ों में बँटी हुई।

जो इस पार वो इस पार,
जो उस पार वो उस पार।
लांघ न पाये बड़े-बड़े भी,
दिल की ये ऊँची दीवार।

पर न रुकता मैं कभी भी,
और न ही कोई रोक पाता है।
मज़ा तो खुल के जीने में है,
बंद पिंजरे में कौन उड़ पाता है।

न रुकी हवा न रुके परिंदे,
तुम्हारी इस दीवार से।
पता नहीं न जाने तुम,
क्यों घबराते प्यार से ?

एक बार दीवार गिराकर देखो,
दिल में प्यार जगाकर देखो।
सुकूँ की नींद तुम सो पाओगे,
वरना लड़ते-लड़ते मर जाओगे।। 

Wednesday, 6 May 2015

तजुर्बा

सड़क किनारे बैठा मैं,
दुनियां संवारता चला।
मौत का सामान देकर,
मैं ज़िंदगी गुज़ारता चला।

सैंकड़ों सावन गुज़र गए,
हर बारिश में मैं डंटा रहा।
दुनियादारी, भूख-प्यास,
बस इन सब में मैं बंटा रहा।

हर सिक्के, हर नोट को लेकर,
तसल्ली मैं करता हूँ।
क्या ये वही चीज़ है
जिससे अपना पेट मैं भरता हूँ?

देते हैं लोग,
दया दिखाकर,
सबको मना मैं करता हूँ।
तुम अदा न कर सकोगे,
जो क़र्ज़ मैं भरता हूँ।

आँखे मेरी धुंधला गई,
हाथ भी कपकपाते है।
करदो आज़ाद अब उस पंछी को,
पिंजरे में जो छटपटाते है।

मर जाऊंगा मैं जब,
किसी को फर्क नहीं पड़ेगा।
लड़ते-लड़ते मैं मर गया,
कल कोई और आकर लड़ेगा।

पर तू चिंता मत कर ज़िंदगी,
तू अकेली नहीं रहेगी।
आज तक मैं साथ था,
कल को किसी और के साथ चलेगी,
किसी और के साथ चलेगी॥


माँ

माँ मुझे मत भेज परदेस,
डर लगता है। 
तेरे आँचल से दूर जाने में,
मुझे डर लगता है। 

तेरा वो खाना लेके पीछे दौड़ना,
मेरा वो तेरे साथ लुक्का-छिपी खेलना। 
सब छोड़कर जाने में,
मुझे डर लगता है। 
माँ मुझे मत भेज परदेस,
मुझे डर लगता है। 

जब बुखार में, मेरी आह निकलती है,
तो आंसू तेरे भी टपकते है। 
जब चोट मुझे लगती है,
तो प्यार से दवाई तू लगाती है। 
तेरे इस प्यार को छोड़ने से,
मुझे डर लगता है। 
माँ मुझे मत भेज परदेस,
मुझे डर लगता है। 

जब अंधेरों से, मैं घिर जाता ,
तब हाथ पकड़कर तू निकाले। 
ज़िंदगी के हर मोड़ पर,
गिरने से भी तू सम्भाले। 
जब कोई इनाम जीत कर लाता हूँ,
तो खुश बहुत तू होती है। 
जब जीतने से मैं रह जाता हूँ,
फिर भी शाबाशी तू देती है। 
मुझ पर तेरे इस विश्वास को,
तोड़ने से डर लगता है। 
माँ मुझे मत भेज परदेस,
मुझे डर लगता है। 

तू मेरे जीवन की डोर है,
क्यों मैं  न ये समझ सका। 
तेरे प्यार की वजह से ही,
मैं अब तक हूँ जी सका। 
क्यों मैं इतना बड़ा हुआ,
जो तेरे प्यार को मैं भूल गया। 
तुझे खोने के बाद ये एहसास हुआ,
कि तेरे बिना सब छूट गया। 
अब जाके तेरी कीमत समझ में आई,
जब मैंने तुझको छोड़ दिया। 

पर माँ, तू मुझे छोड़ना मत,
मुझे डर लगता है। 
तेरे दूर जाने से,
मुझे आज भी डर लगता है॥ 

उड़ना चाहता हूँ मैं

उड़ना चाहता हूँ मैं,
पंछियों की तरह,
पंछियों के साथ,
उड़ना चाहता हूँ मैं।

आसमान में गोते लगाती,
हवा को चीरती हुई,
चीलों के साथ,
उड़ना चाहता हूँ मैं।

हवा की गति से उड़ते हुए,
जो सब पर प्यार बरसाते हैं,
उन विशाल बादलों के साथ,
उड़ना चाहता हूँ मैं।

आसमान में उड़ते हुए,
जब डोर उसकी  कट जाती है।
उड़ते-उड़ते उसकी डोर,
फिर से संभल जाती है।
उस कटी-पतंग की तरह,
उड़ना चाहता हूँ मैं।

नील गगन को छूना चाहता हूँ मैं।
एक बार उन पंछियों के साथ,
 उड़ना चाहता हूँ मैं।