Monday, 10 February 2020

बस रह गए

ज़ख्म बेहतर हुए बस निशान रह गए,
मोहब्बत देख के वो हमारी बस हैरान रह गए।

जितना दुखी इन ज़माने वालों ने किया,
उतनी ऊँची मेरी हँसी देखकर बस परेशान रह गए।

सड़कों पर आजकल देखी जाती है ज़िन्दगी,
जो घर हुआ करते थे अब बस मकान रह गए।

एक बस तुम्ही हो जिसे ज़हन से जाने नही दिया,
बाकि जो थे बस मेहमान रह गए।

पिताजी ने कहा था सब सीख लो हिसाब किताब,
देखो आज मेरे हिस्से में बस नुकसान रह गए।

सुकून, मोहबत वो अपने ये उम्रें सब ले गई हमारी,
आँखों में पले थे जो सपने बस वो जवान रह गए।।

Friday, 27 December 2019

ज़िन्दगी की कहानी

ज़िन्दगी हर रोज़ एक नया कदम लेती है,
हर सुबह उठके एक नया जनम लेती है।
ये छोटी सी सच्चाई तुम्हें बतानी है,
ये ज़िन्दगी तुम्हारी अपनी  ही कहानी है।

हर साल कुछ पन्ने जुड़ जाते हैं,
कुछ कहानियाँ तो कुछ यादों में जुड़ जाते हैं।
कुछ बदल जाते हैं कुछ मोड़ देते हैं,
हर किस्सा तुम्हें कहानी से जोड़ देते हैं।

हर जन्मदिन पर तुम कुछ ठान सकते हो,
हर सपने तुम्हारे अपने हैं ये मान सकते हो।
उठो, चलो, अभी जान बाकि है,
ज़िन्दगी की कहानी में अभी अंजाम बाकि है।।

Monday, 1 July 2019

मेरा गाँव

ओस को अपनी कलम में भरकर
मैं फूलों पर कुछ लिखता हूँ,
एक नई सुबह का गीत कोई
उस मीठी धूप पर लिखता हूँ।

चिड़िया की चहचहाहट को
पत्तों की सरसराहट को,
उस घास की नरमाहट को
एक अर्थ प्रदान करता हूँ।
एक नई सुबह का गीत कोई
उस मीठी धूप पर लिखता हूँ।

घोंसले से उड़े परिंदे
बादल से हाथ मिलाते हैं,
दूर किसी बिदेस से कोई
दाना चुगने आते हैं।
मुँह धोती गुलशन ताल पर
और कौवे संग नहाते है,
अपने-अपने गाँव के किस्से
सब आपस में सुनाते हैं।
ये मेरे गांव की सुबह थी,
मैं अब भी इस सुबह में दिखता हूँ।
एक नई सुबह का गीत कोई
उस मीठी धूप पर लिखता हूँ।।

Sunday, 30 June 2019

अनकही बात

ये जो आँखों में नमी है
ये और कुछ नही बस वो
बची हुई मोहब्बत है जो मैं कभी
तुमसे बेपनाह करता था,
शायद किसी को ये पानी लग सकता है,
और तुम भी अगर ये मानो
तो मुझे कोई हैरानी नही होगी।
हाँ बस ये अफ़सोस ज़रूर होगा कि तुम भी
इसे पानी ही समझती हो।

तुम्हारी गलती नही है
तुमने तो बस इन आँखों में
हमेशा शरारत ही देखी है,
कभी उसमे छिपी मोहब्बत नही देखी।
तुम्हे बस एक  पागल लड़का दिखा
जो हर वक्त तुम्हे हँसाने के लिए
क्या कुछ कर जाता है।
क्या तुम सच में उसे पागल समझती थी
या तुम्हे कभी उन आंखों में डूबता हुआ
प्यार नही दिखा।

क्या तुम्हे कभी नही दिखा कि
थोड़ी सी तवज्जो के लिए वो
कितनी जान छिडकता था।
क्या तुम्हे कभी नही दिखा कि
जब तुम उस रात किसी और के साथ में थी
वो रात वो रो क्यों रहा था,
और जब सुबह 4 बजे तुम रोते हुए उसे
फोन करती हो वो सब भूल कर
तुम्हे क्यों हंसाने लगता था।
क्या तुम्हे सच में लगता था कि
वो प्यार नहीं करता था।।

Friday, 31 May 2019

जब तुमने देखा

जिस सम्त को नज़र उठाकर देखा,
इस दर्द की दवा को आज़माकर देखा।

बेअसर हो गए हैं बेहिसाब दर्द के,
हर नुस्ख़ा उलट-पलट घुमाकर देखा।

फिर लगा शायद ये ख़ुर्शीद की ख़ता है,
चलो आज रात इसे भी बुझाकर देखा।

शायद दूसरे मेहबूब की गली में शफ़ा मिले,
तो हर गली में मेहबूब बनाकर देखा।

जब कहीं सुनवाई नही तो वो सुनता है,
आख़िर में ख़ुदा से दामन फैलाकर देखा।

अब और नही जिया जाता है मियाँ,
हमने ख़ुद में से कहीं जाकर देखा।

जब सब घूमकर वापस तेरे दीदार को आये,
तब कहीं समझे जब तुमने शर्माकर देखा।।

Tuesday, 23 April 2019

मेरी बहन

यूँ तो रिश्तों की कोई गिनती नही
रिश्तेदारी की दुनिया में,
पर हमारे रिश्ते की बात कुछ और है।
अपनों की-सी बात अपनों में ही मिलती नही
समझदारी की दुनिया में,
पर तुम्हारे अपनेपन की बात कुछ और है।

लापरवाही और बेपरवाही सब जन्म से सीख जाते हैं,
ज़िम्मेदारी और समझदारी क्या होती है,
तुम्हारे बाद समझ में आती है।
हर रिश्ते की थोड़ी-थोड़ी मिठास लेकर
इस रिश्ते की बुनियाद होती है,
भाई का मतलब तब समझ आता है
जब वजूद में कोई बहन होती है।

कुछ कच्ची पक्की रोटी सा
कुछ खट्टी मिट्ठी टॉफी सा,
प्यार इसमें मिल जाता है।
कुछ नकली आँख मिचोली हो
कुछ हँसी खेल ठिठोली हो,
वो रिश्ता भाई-बहन हो जाता है।।

Friday, 5 October 2018

एक बाग़ है

आहिस्ता आहिस्ता रिस रहा हूँ मैं
अपनी हथेली की क़ैद से,
रेत बन चुके है सब ख़्याल मेरे
और मैं उन्हें अब रिहा कर रहा हूँ।
जब तक थे यहाँ खूबसूरत बाग
सभी यहाँ रुकने आते थे
कुछ पल साथ बिताते थे,
बहुत ही खुशनुमा सा समां रहता था।

फिर न जाने कहाँ से वो बादल आये
जो बारिश का सपना दिखा रहे थे,
मगर उसमें सिर्फ़ बिजलियाँ ही कड़कती थी।
पर ये बाग़ उसी खुशी के साथ
उसके इंतेज़ार में न जाने कितने ही सावन
खड़ा रहा।
मगर वो बादल कुछ और ही मंसूबे लिए
उसे देख रहा था,
वो कही और ही बरसने का मन बना चुका था
फिर भी इस बाग को सुखाने में लगा हुआ था।
और इस तरह उसके मंसूबों से बेख़बर
ये बाग उसके बरसने के इंतेज़ार में
सूखता चला गया।
वो बादल आज भी वहीं बिजलियाँ कडकड़ाता है
पर हर बार कहीं और ही बरसने निकल जाता है।

अब यहाँ सिर्फ़ रेत ही और बची है
आहिस्ता आहिस्ता मेरी हथेली की कैद से
वो भी रिस रही है।
उस बादल के मोह से निकल वो
चल पड़ा फिर से अपने
बाग को वही पुरानी रवानगी देने।
अब पूरा भरोसा है कि वो बहार लाएगा
इसिलए नही कि अब नए बादल की आस है
पर अब उसने जान लिया कि बहार
बादलों की मोहताज नही होती।।